आपको बता दें की फरवरी महीने में भी जूनियर वारंट ऑफिसर डीएस मंजूनाथ की पैराट्रूपिंग ट्रेनिंग के दौरान पैराशूट न खुलने की वजह से मौत हो गई थी। वह भी एक अनुभवशील अधिकारी थे और ट्रेनिंग मिशन पर थे। लगातार दो महीनों में दो अफसरों की मौत ने यह सवाल और भी गंभीर बना दिया है कि क्या सुरक्षा मानकों को गंभीरता से लिया जा रहा है? या फिर इन मौतों को सिर्फ "दुर्घटना" कहकर फाइलों में दबा दिया जाएगा?
आगरा में वायुसेना के पैराट्रूपर जंप इंस्ट्रक्टर वारंट अफसर राम कुमार तिवारी (41) की ट्रेनिंग के दौरान मौत ने एक बार फिर सैन्य प्रशिक्षण की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में पैराशूट की तकनीकी खामी को वजह बताया गया है, लेकिन क्या सिर्फ यही एक कारण है? "जब सैनिकों की जान ही सुरक्षित नहीं, तो उनकी ट्रेनिंग पर गर्व कैसे करें? कब सुधरेगा सिस्टम? और इन बेवजह की मौतों का जिम्मेदार कौन होगा?"
क्या पुराने उपकरण बन रहे हैं खतरा?
सूत्रों की मानें तो कई बार पुराने या बार-बार इस्तेमाल किए गए उपकरण, जिनका मेंटेनेंस समय पर नहीं होता, वे हादसों की बड़ी वजह बनते हैं। सवाल ये है कि क्या रामकुमार तिवारी का इस्तेमाल किया गया पैराशूट समय पर चेक और अपडेट हुआ था? क्या उसमें किसी तरह की घिसावट या खराबी पहले से नहीं थी?
सिस्टम में लापरवाही या टेक्निकल फेलियर?
वायुसेना के पास सख्त सुरक्षा मानक होते हैं, फिर भी फरवरी महीने में एक और वारंट अफसर डीएस मंजूनाथ की इसी तरह की ट्रेनिंग में मौत हुई थी। बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं सिस्टम में खामियों की ओर इशारा करती हैं। क्या ट्रेनिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की सही जांच नहीं हो रही? या फिर पैसे और संसाधनों की कमी के चलते पुराने उपकरणों को दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है?
किसकी जवाबदेही?
जब दो अनुभवी अफसरों, जिन्होंने सैकड़ों सफल छलांगें लगाई हों, ट्रेनिंग के दौरान गिरकर दम तोड़ दें, तो क्या यह केवल "दुर्घटना" कहकर टाल देना काफी है? क्या वायुसेना की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने ही ट्रेनर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करे? क्या पैराशूट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की जांच नहीं होनी चाहिए? और सबसे अहम – क्या ऐसी मौतों की गहराई से जांच कराई जाएगी या फाइलें बंद कर दी जाएंगी?
पिछले महीने भी गई थी एक अफसर की जान
गौरतलब है कि फरवरी महीने में भी एक ऐसा ही दर्दनाक हादसा हुआ था, जब जूनियर वारंट ऑफिसर डीएस मंजूनाथ की पैराट्रूपिंग ट्रेनिंग के दौरान पैराशूट न खुलने की वजह से मौत हो गई थी। वह भी एक अनुभवशील अधिकारी थे और ट्रेनिंग मिशन पर थे। लगातार दो महीनों में दो अफसरों की मौत ने यह सवाल और भी गंभीर बना दिया है कि क्या सुरक्षा मानकों को गंभीरता से लिया जा रहा है? या फिर इन मौतों को सिर्फ "दुर्घटना" कहकर फाइलों में दबा दिया जाएगा?
परिवारों पर टूटा कहर, सिस्टम पर खामोशी क्यों?
राम कुमार तिवारी का परिवार आगरा में ही रहता था — पत्नी प्रीति तिवारी, दो बेटे यश (14) और कुश (10)। हादसे की खबर सुनते ही परिवार पर ग़म का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन आज तक किसी सिस्टम ने यह नहीं बताया कि ऐसी मौतों की असल वजह क्या थी, और अगली बार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?
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