जी-20 से मिली प्रेरणा, कबाड़ से क्रिएटिविटी की ओर से अब तक 30 लाख रुपये की कमाई सिर्फ कबाड़ निस्तारण से हो चुकी है।
ताजमहल की ओर यमुना किनारे चलते हुए अब सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि आधुनिक सौंदर्य और पर्यावरण जागरूकता का अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है। यमुना आरती स्थल पर स्थापित 26 फीट ऊंची लड्डू गोपाल की प्रतिमा, प्रमुख शिव मंदिरों के बाहर विशाल डमरू, वीआईपी रोड पर जानवरों की आकर्षक मूर्तियां और आवास विकास का "सांप-सीढ़ी पार्क" – यह सब कुछ शहर को एक नई पहचान दे रहे हैं। लेकिन इन कलाकृतियों की शुरुआत जहां से हुई, वह कहानी और भी दिलचस्प है।
कबाड़ से क्रिएटिविटी की ओर: एक प्रयोग जो रंग लाया
2023 के अंत में शहर की तस्वीर बदलनी शुरू हुई, लेकिन इसकी नींव फरवरी 2023 में रखी गई, जब आईएएस अंकित खंडेलवाल ने नगर आयुक्त का पदभार ग्रहण किया। नगर निगम की वर्कशॉप का निरीक्षण करते हुए उन्होंने देखा कि वहां कबाड़ के "छोटे पहाड़" जमा हैं – जंग खाए लोहे के ढेर, टायरों की भरमार और प्रदूषण फैलाती गंदगी। यहीं से जन्म हुआ एक नए विचार का – क्यों न कबाड़ को कला में बदला जाए?
जी-20 से मिली प्रेरणा, शहर ने पहनी नई शक्ल
G-20 समिट के मद्देनज़र शहर को सजाने के लिए मंगाई गई कलाकृतियों ने एक राह दिखाई। स्थानीय फेब्रीकेटर्स और डिज़ाइनरों की टीम बनाई गई, जिनमें जावेद जैसे हुनरमंद लोग शामिल थे। कबाड़ की छंटाई के बाद जानवरों की मूर्तियों से शुरुआत हुई — शेर, भालू, हिरन जैसे आकार तैयार हुए। फिर इन कलाओं को सार्वजनिक स्थलों पर सजाया गया।
शहर के प्राचीन शिव मंदिरों – मनकामेश्वर, राजराजेश्वर – के बाहर बड़े डमरू स्थापित किए गए, जिससे आध्यात्मिक वातावरण में नया रंग भर गया। साथ ही, राम मंदिर की भव्य प्रतिकृति भी तैयार की गई है, जिसे जल्द ही उपयुक्त स्थान पर स्थापित किया जाएगा।
टायरों से बना सोफा, टेबल और झूले
पुराने टायर, जो पहले प्रदूषण का कारण बनते थे, अब कुर्सियों, टेबलों, मिकी माउस की आकृतियों और झूलों में तब्दील हो चुके हैं। नगर निगम कार्यालय से लेकर शहर के पार्कों तक इनसे सजावट की गई है। बुजुर्गों के बैठने के लिए पार्कों में आरामदायक कुर्सियां लगाई गई हैं। बच्चों के लिए झूले भी आकर्षण का केंद्र बने हैं।
नगर आयुक्त बोले – "कबाड़ से कमाई भी, छवि भी"
नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने बताया, "ताजमहल विश्व का अजूबा है, लेकिन हमें आगरा की छवि और भी निखारनी थी। हमने सोचा कि कबाड़ को कला में बदला जाए। अब तक 30 लाख रुपये की कमाई सिर्फ कबाड़ निस्तारण से हो चुकी है, और आगंतुकों को शहर की नई छवि पसंद आ रही है।"
आगरा अब सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि नवाचार की भी मिसाल बन रहा है। कबाड़ से शुरू हुई यह रचनात्मक यात्रा अब पूरे शहर को एक नई पहचान दे रही है – स्वच्छ, सुंदर और सृजनात्मक। यमुना किनारे चलिए, वहां सिर्फ हवा नहीं, बदलाव की बयार भी बह रही है।
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