14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां 800 मेगावाट की नई यूनिट का शिलान्यास करने आ रहे हैं। पहले से ही यहां 300-300 मेगावाट की दो यूनिटें काम कर रही हैं, लेकिन गांववालों की परेशानी साल दर साल बढ़ती जा रही है।
"कभी शहनाइयां बजती थीं, अब सन्नाटा पसरा रहता है। पहले जहां हर त्यौहार पर मेहमानों की रेल-पेल रहती थी, अब घर का दरवाज़ा शायद ही कोई खटखटाता हो..." हरियाणा के रतनपुरा गांव में रह रहे लोगों की ये हालत है। वजह — गांव के पास बना थर्मल पावर प्लांट, जिसकी काली राख ने ज़िंदगी का रंग छीन लिया है। न तो शादियां हो रही हैं, न ही रिश्ते तय हो रहे। और जो तय होते हैं, वो भी घर की दीवारों पर जमी धूल और ज़हर सी हवा देखकर टूट जाते हैं।
राख ने सिर्फ छतें नहीं ढकी, उम्मीदें भी ढक दीं
गांव की गलियों में पहले बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, अब खांसी और दवाइयों की बोतलों की आवाज़ें सुनाई देती हैं। कपड़े खुले में सूखाना तो दूर, घर के आंगन में बैठना तक मुश्किल हो गया है। हर दूसरा ग्रामीण किसी न किसी बीमारी से जूझ रहा है। खासकर बुजुर्ग और छोटे बच्चों की हालत सबसे ज्यादा खराब है।
"विकास चाहिए, लेकिन ज़िंदगी की कीमत पर नहीं"
गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि उन्हें थर्मल प्लांट से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन गांव को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए। "सरकार बिजली बना रही है, अच्छा है, लेकिन क्या हम राख में घुट-घुट कर जीने के लिए मजबूर हैं?" – पूर्व सरपंच जितेंद्र राणा का सवाल है।
अब तीसरी यूनिट का शिलान्यास, लेकिन गांव की हालत जस की तस
14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां 800 मेगावाट की नई यूनिट का शिलान्यास करने आ रहे हैं। पहले से ही यहां 300-300 मेगावाट की दो यूनिटें काम कर रही हैं, लेकिन गांववालों की परेशानी साल दर साल बढ़ती जा रही है। गांव की आबादी 2300 के करीब है, 350 घर हैं। ज़्यादातर घरों में शादी लायक युवक हैं, लेकिन जब कोई रिश्ता आता है, तो वो राख से सने आंगन और दीवारें देखकर वापस लौट जाता है। "लोग साफ कहते हैं, वहां रहकर बीमार हो जाएंगे, शादी नहीं करेंगे," – ग्रामीण सतीश राणा बताते हैं।
सरकार को अब जवाब देना होगा
रतनपुरा के लोग बस इतना चाहते हैं कि उन्हें वहां से हटाकर किसी साफ-सुथरे स्थान पर बसाया जाए। उन्हें विकास से दिक्कत नहीं, लेकिन सवाल ये है कि क्या बिजली बनाने की कीमत इंसानों की सेहत होनी चाहिए?
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