अक्षय तृतीया : शुभता, समृद्धि और सनातन परंपरा का पर्व

Vishal Singh | धर्म | 58

अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस आस्था की अभिव्यक्ति है जिसमें शुभ कर्म, सेवा और समर्पण से जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है। इस दिन किया गया दान, पूजा और खरीददारी अक्षय पुण्य प्रदान करती है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। 

अक्षय तृतीया एक अत्यंत पावन और शुभ तिथि मानी जाती है, जिसे 'अखा तीज' भी कहा जाता है। 'अक्षय' का अर्थ होता है, जिसका कभी क्षय न हो यानी जो कभी न समाप्त हो। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल अनंतकाल तक अक्षय रहता है। यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है, और इसे जैन और हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है।

क्यों मनाई जाती है अक्षय तृतीया?
इस दिन अनेक पौराणिक घटनाएं घटी थीं, जिनमें मुख्य हैं: 

  • इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था।
  • महाभारत काल में युधिष्ठिर को अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था जिससे अन्न की कभी कमी नहीं हुई।
  • त्रेतायुग में भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर उसे दरिद्रता से मुक्त किया था।
  • यह दिन भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और परशुराम जी की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

कैसे मनाई जाती है अक्षय तृतीया?

  • प्रातः स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण किए जाते हैं।
  • घर में लक्ष्मी नारायण की विशेष पूजा होती है।
  • दान का विशेष महत्व होता है: जल, फल, वस्त्र, अन्न, गाय, स्वर्ण और छाता आदि दान किए जाते हैं।
  • इस दिन व्रत रखकर मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है।

कब और कहां मनाई जाती है?
यह पर्व हर वर्ष अप्रैल-मई के बीच आता है और भारत के सभी हिस्सों में, विशेषकर उत्तर भारत, पश्चिम भारत (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र), दक्षिण भारत और नेपाल में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

इस दिन क्या खरीदना चाहिए और क्यों?

  • सोना व चांदी: माना जाता है कि इस दिन सोना-चांदी खरीदना समृद्धि और मां लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है।
  • भूमि व संपत्ति: नए व्यवसाय, गाड़ी, जमीन खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • नवीन वस्त्र, बर्तन, अन्न: ये सभी वस्तुएं स्थायी सुख-समृद्धि देती हैं।
  • कहते हैं कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त के भी किया जा सकता है क्योंकि पूरा दिन ही अबूझ मुहूर्त होता है।

अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस आस्था की अभिव्यक्ति है जिसमें शुभ कर्म, सेवा और समर्पण से जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है। इस दिन किया गया दान, पूजा और खरीददारी अक्षय पुण्य प्रदान करती है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।