पूछताछ में सामने आया कि ज़िकरा इलाके में पिस्तौल लेकर घूमती थी। ज़िकरा न सिर्फ खुद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थी, बल्कि उसने 8-10 नाबालिग लड़कों की एक गैंग तैयार कर रखी थी, जिनका इस्तेमाल वह धमकाने, वर्चस्व जमाने और हमले करवाने में करती थी।
सीलमपुर का एक 17 साल का लड़का, कुणाल सिंह, जो सिर्फ अपने बीमार पिता के लिए दूध लेने निकला था, घर लौट नहीं सका। कुछ ही मिनटों में इलाके की गली खून से लाल हो चुकी थी और कुणाल के शरीर पर चाकुओं के बेरहम निशान थे। एक मां का लाल और एक पिता का सहारा, उस दिन दिल्ली की बेरहम सड़कों पर बेवजह मारा गया।
'लेडी डॉन' ज़िकरा की गिरफ्तारी से खुला संगठित अपराध का चेहरा
हत्या की जांच ने जो परतें खोलीं, उसने सामाजिक और कानूनी व्यवस्था को भी झकझोर कर रख दिया। पुलिस ने जिस महिला को गिरफ्तार किया है, उसे इलाके में 'लेडी डॉन' ज़िकरा के नाम से जाना जाता है। पूछताछ में सामने आया कि ज़िकरा न सिर्फ खुद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थी, बल्कि उसने 8-10 नाबालिग लड़कों की एक गैंग तैयार कर रखी थी, जिनका इस्तेमाल वह धमकाने, वर्चस्व जमाने और हमले करवाने में करती थी।
कुणाल की रेकी करवाई गई, फिर सरेआम हत्या
पुलिस के अनुसार, कुणाल की हत्या कोई तात्कालिक गुस्से में किया गया अपराध नहीं था। यह एक सुनियोजित साजिश थी, जिसमें ज़िकरा ने पहले अपने नाबालिग लड़कों से कुणाल की रेकी करवाई। जैसे ही सूचना मिली कि कुणाल जीटीबी अस्पताल से निकला है, ज़िकरा अपने गैंग के साथ निकली। और फिर, साहिल और दिलशाद नामक लड़कों ने उस पर चाकुओं से ताबड़तोड़ हमला कर दिया।
नाबालिगों को अपराध की दुनिया में धकेलने का मामला
ज़िकरा का नेटवर्क अकेले उसका नहीं था। वह जेल में बंद ज़ोया नाम की महिला अपराधी की 'बाउंसर' भी रह चुकी है। अब सवाल ये है कि क्या दिल्ली के अंदर एक सुनियोजित महिला आपराधिक सिंडिकेट तैयार हो चुका है, जो नाबालिग लड़कों को मोहरा बनाकर अपराध करवा रहा है? क्या इन बच्चों को गरीबी, बेरोज़गारी और शिक्षा की कमी की वजह से अपराधी बनाया जा रहा है?
मां का सवाल: मेरे बेटे का क्या कसूर था?
कुणाल की मां परवीन ने रोते हुए कहा, "मेरा बेटा किसी झगड़े में नहीं था। ज़िकरा इलाके में पिस्तौल लेकर घूमती थी। उसका चचेरा भाई साहिल किसी झगड़े में घायल हुआ था, लेकिन कुणाल का उससे कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी उन्होंने उसे बेरहमी से मार डाला।"
सवाल जिनका जवाब अभी बाकी है?
कितने नाबालिग ज़िकरा के गैंग में शामिल थे? क्या ज़िकरा अकेली महिला गैंग लीडर है या दिल्ली में ऐसे और भी नेटवर्क हैं? इन बच्चों को बचाने और अपराध से दूर रखने की जिम्मेदारी किसकी है, समाज, सरकार या पुलिस की? क्यों दिल्ली की गलियों में अपराधी और पीड़ित दोनों कम उम्र के हो रहे हैं?
जरूरत सिर्फ सज़ा की नहीं, सुधार की भी
ज़िकरा और उसके सहयोगियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, यह तो स्पष्ट है। लेकिन सवाल यह भी है कि हम ऐसे नाबालिगों को समय रहते अपराध के दलदल से बाहर निकालने के लिए क्या कर रहे हैं? क्या हमारे स्कूल, मोहल्ले, एनजीओ और पुलिस-प्रशासन मूलभूत सामाजिक हस्तक्षेप कर रहे हैं? क्यों नहीं हम यह सुनिश्चित कर पा रहे कि कोई कुणाल कल फिर से दूध लेने निकले और जिंदा लौटे।
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